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इसलिए कोई राष्ट्र आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में उत्रति करना चाहता है तो उसे निरक्षरता के उन्मूलन के लिए भरपूर प्रयास करने होगे और यह चेष्टा करनी होगी कि देश के सभी नागरिक साक्षर हो जायें । इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारत में प्रजातंत्र के लिए प्रगतिशील मार्ग-प्रशरत्त करते हुए सभी के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की
इस प्रकार हम कह सकते है । कि धर्म, जाति, लिग स्थान, प्रजाति आदि का विचार करते हुए सभी के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना ही शिक्षा का सार्वभौमीकरण या सार्वजनीकरण है। 11.3 सार्वजनिक शिक्षा: सामाजिक परिवर्तन के अभिकर्ता के रूप में ।
सार्वजनिक शिक्षा किस स्तर तक प्रदान की जाये, यह देश विशेष की राजनैतिक इच्छा, आर्थिक सामर्थ्य तथा शिक्षा के प्रति निष्ठा के ऊपर निर्भर करता है । उदाहरणार्थ, इंग्लैण्ड में पाँच वर्ष से लेकर 15 वर्ष की आयु के बालकों के लिए पाठशाला में उपस्थिति अनिवार्य है ।
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अमेरिका के अधिकांश राज्यों में 7 से 16 वर्ष तक की आयु के सभी बालक बालिकाओं के लिए पाठशाला जाना आवश्यक है । रूस में सात वर्ष की आयु के प्रत्येक बालक को पाठशाला जाना आवश्यक है । वहाँ 3-7 आयु वर्ग से बालकों के लिए किन्दरगार्डन शालाओं में जाना भी अनिवार्य है | जापान में 1946 के संविधान की धारा 26 के अनुसार अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गई है और इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को योग्यतानुसार शिक्षा प्राप्त करने का समान अधिकार प्रदान किया गया है । 1947 में 13 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य कर दिया गया था इसके बाद 1949 में इस सीमा को बढ़ाकर 6 से 15 वर्ष कर दिया गया है । विश्व के प्रायः सभी सम्पन्न देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क स्विजरलैंड, स्पेन आदि में सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था है, तथा प्रायः सभी विकासशील देशों में भी इस प्रकार की शिक्षा के महत्व को स्वीकारा जा रहा है । स्वतंत्र भारत में 1950 के संविधान के 45 वे आर्टीकल में यह संकल्प किया गया था कि आगामी 10 वर्षों में सम्पूर्ण भारत में 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग में सार्वजनिक शिक्षा सुलभ करवा दी जायेगी यद्यपि यह लक्ष्य पूरा नही हो पाया, तथापि यहाँ इस बात को समझना आवश्यक है कि सार्वजनिक शिक्षा को प्रदान करने के संकल्प व प्रयासों के पीछे क्या महत्व संबंधी कारक रहे है।
वस्तुतः किसी भी देश की आर्थिक समृद्धि, सामाजिक चेतना, राजनैतिक एकता व विकास, लोकतंत्र तथा जीवन स्तर की उच्चता के प्राप्त करने के लिए उत्तम शिक्षा का न्यूनतम स्तर नितांत आवश्यक है क्योंकि अनपढ़ व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध नही हो सकते है । थोथी बहुत शिक्षा तो मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, गृहिणी, व्यापारी जनता के प्रत्येक सदस्य के लिए भी आवश्यक है । आज भी हमारे देश में बड़ी संख्या में बुजुर्ग व मध्यम आयु वर्गों के स्त्री-पुरुष लिखना, पढ़ाना, गिनना दस्तखत करना नही जानते है जिनके फलस्वरूप उन्हें लगातार अपने आत्म सम्मान और गौरव को ठेस खाते हुए देखना पड़ता है । कलकारखानों, खेतों तथा अन्य उत्पादन केन्द्रों में उत्पादन की वृद्धि आर्थिक, समृद्धि, सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति, अंधविश्वासों व रूढ़ियों से युक्ति तथा राजनैतिक चेतना, आधुनिकता तथा राष्ट्रीय विकास शिक्षित नागरिकों के प्रयासों के द्वारा ही संभव है । अशिक्षित व्यक्ति तो एक प्रकार का बोझा या बाधा ही सिद्ध होते है । यदि कोई राष्ट्र बचपन व किशोर अवस्था के कुछ वर्षा 6-7-8 या 10 वर्षों तक सार्वजनिक शिक्षा की एक उत्तम व्यवस्था कोई करता है। और सभी बालक-बालिकाओं को निशुल्क अनिवार्य रूप से शिक्षा प्रदान करता है तो निश्चय ही देश में सामाजिक परिवर्तन आता है, सुधार और विकास होता है ।
विश्व के अधिकांश राष्ट्र प्रजातन्त्रीय राष्ट्र है | ऐसे देशों में सभी नागरिकों के लिए अपने राष्ट्र की आजादी को कायम बनाये रखने के लिए अपने राजनैतिक अधिकारों और कर्तव्यों तथा संविधान के विविध प्रावधानों को भली-भांति समझना आवश्यक है । आज के विश्व में अन्र्तदेशीय सद्भाव तथा विश्व-बंधुत्व व अन्तराष्ट्रीय सहयोग से सक्रियतापूर्वक भाग लिये बिना कोई राष्ट्र आधुनिक सफल तथा गतिशील नही रह सकता । जिन देशों की अधिकांश या एक मात्र जनता अशिक्षित होती है उनके लिए आधुनिक विश्व में प्रगति की दौड़ में भाग लेना असंभव हो जाता है अफ्रीका और एशिया के कुछ देशों जिनमें जनसंख्या की अभिवृद्धि तथा
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आर्थिक तनावों के कारण सार्वजनिक शिक्षा अभी तक वास्तविक नही बन पाई है । इसके लिए न केवल अपना विकास करना बल्कि अपनी स्वंतत्रता का सार्वभौमिकरण को बनाये रखना कठिन हो जाता है । ऐसे देशों में प्रायः राजनैतिक सत्तापलट तथा मिलेटरी शासन और तानाशाही का ताण्डव नृत्य होता हुआ देखा जाता है । ऐसे कई देशों में ऐसी राजनैतिक गतिविधियों तथा शोषण के अस्तित्व का कारण वस्तुतःउनमे सार्वजनिक शिक्षा की उत्तम व्यवस्था का अभाव ही रहा है | लोककल्याणकारी भावना के संचालित होने वाले देशों में सार्वजनिक शिक्षा एक अनिवार्यता मानी जाती है तथा वहाँ की सरकारें सभी लोगों को शिक्षित करने के लिए बहुत बड़ी धन राशियाँ प्रतिवर्ष व्यय करते है । वे जानते है कि सार्वजनिक शिक्षा से उनके नागरिकों के शान, मूल्यों दृष्टिकोणों, आर्थिक उत्पादन क्षमता तथा सामाजिक सांस्कृतिक उत्थान तथा राजनैतिक चेतना में समुन्नत अभिवृद्धि अवश्य होगी, तथा उसमे आत्मसम्मान तथा आत्मविश्वास बढ़ेगा । इन्ही कारणों से प्रभावित होकर स्वतंत्र भारत से भी सार्वजनिक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमारी सरकार तथा हमारा समाज कटिबद्ध
11.4 शिक्षा के सार्वजनिकरण की आवश्यकता एवं महत्व
शिक्षा को सर्वसुलभ बनाना अत्यन्त आवश्यक एवं अनिवार्य है । सामाजिक परिवर्तन वांछित गति प्राप्त करें तथा राष्ट्र का विकास हो इसके लिए भी शिक्षा का सार्वभौमिकरण किया जाना चाहिए | क्योंकि शिक्षा के अभाव में किसी भी राष्ट्र की उन्नति व अवनति का अनुमान नहीं किया जा सकता । अतः सम्पूर्ण राष्ट्र का विकास व उन्नति का आधार सार्वजनिक शिक्षा
है |
वर्तमान समय में शिक्षा के सार्वजनिकरण की आवश्यकता एवं महत्व के अधोलिखित कारण है :(1) साक्षरता प्रसार में सहायक – भारत की अधिकांश जनता निरक्षर है । 2001 की
जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता 65.38 : है, जिसमें पुरूषों में साक्षरता का प्रतिशत 75.38: है वही महिलाओं का 54.16: ही है । साक्षर व्यक्ति सामाजिक परिवर्तन को तर्क विचार, प्रस्थिति को ध्यान में रखकर स्वीकार कर लेता है और समाज समयानुसार प्रगति पथ पर अग्रसित होता चला जाता है । सामाजिक प्रगति हेतु

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