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भविष्य विज्ञान की योजना बनाने के लिये पृष्ठभूमि के लिये योजना बनाने के लिये तथा योजना क्रियान्विति के लिये, जिससे भविष्य भय उत्पन्न न होने पाये । 4. नीति निर्धारण के योग्य बनाना
भविष्य विज्ञान बालक को नीति निर्धारण के योग्य बनाता है व भविष्य विज्ञान नव शाखा का सृजन करता है ।। 5. वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप योजना निर्माण
भविष्य विज्ञान वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप योजना बनाने तथा इस योजना के परिणामों के पूर्व आकलन के लिये तैयार रहता है । 6. नव परिवर्तन को तैयार
भविष्य विज्ञान आधुनिकता में विश्वास करता है और प्रतिदिन नव परिवर्तन के लिये तत्पर रहने की कोशिश करता है । भविष्य विज्ञान नये-नये परिवर्तनों के द्वारा हर सम्भव यह प्रयत्न करता है कि नये आविष्कारों का सृजन हो और प्रत्येक स्तर पर नव निर्माण का कार्य होता रहे।
संक्षेपतः यह कहा जा सकता है कि इसके अन्तर्गत वैज्ञानिक आधार पर भविष्य के लिय कार्य योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने का प्रयास किया जाता है, जिससे आने वाले समय
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की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सके । इसका विकास बड़ी तेज गति से हो रहा है । भारत में भविष्य की शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर विचार किया गया है । 10.9 भविष्य शिक्षा की विषय सामग्री तथा शिक्षा प्रक्रिया
भविष्य शिक्षा की विषय सामग्री समूह के लिये न होकर व्यक्ति विशेष के अनुसार होगी ।
– सीखने का दायित्व सीखने वाले का होगा । – पृथक् से एक सीखने वाला समाज (Learning Society) अथवा सीखने वाला
वातावरण (Learning environment) बनाना होगा । – सीखने की औपचारिक व्यवस्थाओं के स्थान पर पूर्णतया गतिशील व्यवस्थाये होनी
चाहिये । – विद्यालय, शिक्षण सामग्री के केन्द्र (Learning resource Centre) के रूप में होने
चाहिये । – शिक्षक आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन करे, सहायता करें । – शिक्षा व्यक्तिगत (Individualized) हो । – चयन के स्थान पर मार्गदर्शन पर बल दिया जाये ।। – सीखने वाले को सीखने के कार्य में उत्प्रेरित किया जाये । – आयु सीमा, विषयों, पाठ्यक्रमों, स्तरों, परीक्षाओं के कृत्रिम अवरोध समाप्त किये जाने
चाहिये ।। 10.10 भविष्य शिक्षा के स्तर, प्रशासन तथा अर्थ
– पूर्व प्राथमिक शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा पर बल दिया जाये । – अन्र्तविषयी शिक्षण व शोध कार्य पर बल । – शिक्षा में आवश्यक सुधार, परिवर्तन व आधुनिकीकरण । शिक्षा राष्ट्र विशेष की दार्शनिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक मांगों को पूरा
करने में समर्थ हो । – विद्यालय, प्रशासन विकेन्द्रित हो ।
भविष्य की शिक्षा गतिशील, सामाजिक असमानताओं और अन्यायों से मुक्ति दिलवाने वाली तथा परम्परागत होनी चाहिये । राष्ट्र विशेष की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विकास की अवस्थाओं एवं आवश्यकताओं के अनुसार भविष्य की शिक्षा सबल एवं सक्षम होनी चाहिये । समाज के विभिन्न वर्ग के लोग यदि खुले दिमाग से समाज के भविष्य के बारे में खुल दिमाग से चर्चा करें तो यह सम्भव हो सकता है कि भविष्य की शिक्षा राष्ट्र विशेष के लिये सबल एवं सूक्ष्म रूप में कार्य करें । 10.11 शिक्षा के संदर्भ में भविष्य की संभावनायें व भारतीय
समाज का परिदृष्य
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भविष्योन्मुखी शिक्षा पर दूर दृष्टि से पूर्व शिक्षा और समाज के पारस्परिक संबंध पर एक दृष्टि समुचित है । शिक्षा सामाजिक और आर्थिक शक्तियों को तथा उनके विकास को उपयुक्त दिशा की ओर प्रस्तुत करने का प्रयास है ।।
भविष्य की शिक्षा के सम्बन्ध में उद्देश्य तथा रास्ते दोनों पर विचार करना है । विकास के आज के प्रतिभाओं तथा शिक्षा के पीछे मूल चिन्तन अलगाववाद का है । भविष्य विज्ञान आर्थिक व मानवीय आधार पर विकास के नये-नये अवसर प्रदान करता है । विकास की ओर उन्मुख व्यक्तित्व एक सुन्दर सभ्य समाज के निर्माण में सकारात्मक, रचनात्मक सहयोग देने मे सहभागी होते हैं । जिसका प्रभाव सामाजिक वातावरण परिस्थितियों व जीवन पर प्रत्यक्षतः दिखाई देता है । मूल्य आधारित सुन्दर व सभ्य समाज का निर्माण कर सत्य शिव सुन्दरम् पर आधारित समाज की संकल्पना भविष्य में समाज में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है ।
यूनेस्को की रिपोर्ट लनिंग दुबी के अनुसार भविष्य की शिक्षा महत्वपूर्ण विशेषताएं तथा मांगे इस प्रकार है। 1 भविष्य की शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य होने चाहिए –
अ अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय का निर्माण करना, ब लोकतंत्रीय मूल्यों में आस्था उत्पन्न करना, स मानव का सम्पूर्ण विकास करना
द जीवन पर्यन्त चलने वाली शिक्षा प्रदान करना । 2 विषयवस्तु वैयक्तिक होगा । 3 विद्यालय प्रशासन विकेन्द्रीकरण होगा । 4 शिक्षा मानवीकृत होगा । 5 चयन के स्थान पर मार्गदर्शन पर बल दिया जायेगा । 6 अन्तविषयी शिक्षण पर बल दिया जायेगा । 7 विद्यालय शिक्षण सामग्री केन्द्र के रूप में होंगे । 8 शिक्षा की आधुनिक तकनीकी का शिक्षण में अधिकाधिक प्रयोग किया जायेगा । 9 शाला लोकतंत्रीय सिद्धान्तों पर आधारित होगी । उसमें समता पर बल दिया जायेगा । 10 आयु, सीमा, विषयों, पाठ्यक्रमों के कृत्रिम अवरोधक समाप्त किये जायेंगे । 11 प्रत्येक सीखने वाले को स्वयं ही अपनी शिक्षा का दायित्व संभालना होगा । एक लर्निग
सोसायटी अथवा लर्निग एनवायरमेन्ट की स्थापना पर बल दिया जायेगा । 12 शिक्षा की खुली व्यवस्था होगी जिसमें सीखने वाला अपनी इच्छा क्षमता, गति के
प्रसार अपने जीवन के लिये उपयोगी ज्ञान को किसी भी स्रोत से प्राप्त कर सकेगा । भारत में भविष्य की शिक्षा –
भारत में भावी शिक्षा के स्वरूप के विषय में आजकल विचार-विमर्श होना प्रारम्भ हो गया है । विद्वानों ने इस विषय पर लेख भी लिखे है । मद्रास विश्वविद्यालय के कुलपति डी आदिशेषेया डी. जे.एम. कपूर व डा.एस सी. सेठ ने इसमें अपने विचार व्यक्त किये हैं । भारतीय विचारक भी फ्युचर शॉक’ डी स्कूलिंग सोसायटी स्कूल इज डेड लर्निग दुबी आदि पुस्तकों तथा प्रतिवेदनों से प्रभावित है । उन्होंने इनमें वर्णित विचारों को भावी शिक्षा के स्वरूप
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चिन्तन में आधार बनाने के लिये कदम उठाये हैं । आने वाले समय में यह मानने के लिये बाध्य होंगे कि भविष्य के बारे में हमारी कल्पना ही शिक्षा का स्वरूप निर्धारित नहीं करती वरन् शिक्षा स्वयं भी भविष्य का चित्र बनाती है ।
1 भविष्य में शिक्षा की संरचना अधिक लचीली, खुली तथा छात्र सापेक्ष होगी । 2 नई तकनीकों तथा प्रोद्योगिकी के शिक्षा में प्रवेश के कारण शिक्षकों के लिये पूर्व
तैयारी,आयोजन तथा अन्तर-विषय सहयोग का महत्व बढ़ता जायेगा । 3 आजकल शाब्दिक ज्ञान पर अधिकार शिक्षा का आदि तथा अन्त है | यह ज्ञान भी बड़ा
उथला तथा सतही है | भावी समाज में रचनात्मक असहमति का विकास ही शिक्षा की

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