sdvsv


14.8.5 व्यावसायिक शिक्षा आयोग ने व्यावसायिक शिक्षा के अग्रलिखित अंगों के माध्यम से करने के बाद सुझाव दिए(अ) कृषि (ब) वाणिज्य (स) शिक्षा (द) इन्जीनियरिंग और तकनीकी (य) कानून (र) चिकित्सा (ल) औद्योगिक सम्बन्ध आदि । (अ) कृषि । 1. भारत एक कृषि प्रधान देश है अत: कृषि शिक्षा को एक प्रमुख राष्ट्रीय समस्या मान
लिया जाए । 2. कृषि शिक्षा, कृषि अनुसंधान ओर कृषि नीति का निर्माण उन्हीं व्यक्तियों और समूहों
द्वारा किया जाना चाहिए जो इसका पूर्ण ज्ञान रखते हों । 3. वर्तमान कृषि कॉलेजों को साधनों एवं शिक्षक वर्ग से अधिक समृद्ध बनाया जाए । 4. वर्तमान कृषि अनुसंधान प्रयोगशालाओं को सहयोग दिया जाए और पूर्ण रूप से
विकसित किया जाए, जिससे उनके कार्य की गुणवत्ता सार्थक सिद्ध हो सकें । 5. भारतीय परिषद् के अन्तर्गत कृषि नीति संस्थान स्थापित होने चाहिए, जो दीर्घकालीन
भारतीय कृषि नीति को स्पष्ट करने के लिए अध्ययन और अनुसंधान करें । 6. कृषि शिक्षा की संस्थाएँ यथासम्भव ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित की जाएँ, जिससे छात्रों को
जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव और व्यावहारिक कार्य करने का अवसर मिल सके । (ब) वाणिज्य | 1. विश्वविदयालय में अपने अध्ययन के दौरान में एक वाणिज्य छात्र को विभिन्न
व्यवसायों में व्यवहारिक कार्य करने के अवसर दिये जाने चाहिए । 2. स्नातक हो जाने के बाद उन में से कुछ को एकाउण्टेन्सी जैसे विशेष व्यवसाय में विशेषज्ञता प्राप्त करने की सलाह दी जानी चाहिए और अपेक्षित व्यावहारिक प्रशिक्षण
प्राप्त कराना चाहिए । 3. वाणिज्य में स्नातकोत्तर उपाधि के लिए पुस्तकीय अध्ययन कम होना चाहिए | (स) शिक्षण
1. पाठ्यक्रमों में संशोधन होना चाहिए और स्कूल अभ्यास को अधिक समय दिया जाना | चाहिए तथा छात्रों के कार्य निर्धारण में अभ्यास पर अधिक बल दिया जाना चाहिए । 2. व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त विद्यालयों का ही उपयोग होना चाहिए । 3. छात्रों को स्कूल के प्रचलित अभ्यास को अपनाने तथा उसे श्रेष्ठ बनाने के लिए
प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । 4. प्रशिक्षण महाविद्यालयों के अधिकांश शिक्षकों को उन्हीं व्यक्तियों में से चुना जाना
चाहिए जो विद्यालय शिक्षण का प्रत्यक्ष अनुभव रखते हो । (द) इंजीनियरिंग एवं तकनीकी 1. वर्तमान इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी की संस्थाओं को देश की राष्ट्रीय सम्पत्ति माना
जाना चाहिए।
187
2. फोरमैन, हाटसमैन और ओवरसियरों को शिक्षा देने वाले इंजीनियरिंग स्कूलों की संख्या
बढ़ाई जाये। 3. इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम में ‘सामान्य शिक्षा’ और आधारभूत भौतिक और इंजीनियरिंग
विज्ञानों को शामिल किया जाए । 4. इंजीनियरिंग कॉलेजों को राजकीय विभागों और मंत्रालयों के नियंत्रण में न रखकर
विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध कर दिया जाए । 5. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिक शिक्षा के लिए
अधिक से अधिक आर्थिक सहायता दी जाए । (य) कानून
1. कानून के सब कॉलेजों का पूर्ण रूप से पुनर्गठन किया जाए । 2. विश्वविद्यालयों द्वारा कानून- विभाग के शिक्षकों की नियुक्ति उसी तरह की जाए,
जिस तरह दूसरे विभागों के शिक्षकों की जाती है । 3. कानून के विशेष विषयों का पाठ्यक्रम 3 वर्ष रखा जाए और अंतिम वर्ष व्यावहारिक
कार्य में लगाया जाए । 4. जहाँ भी कानून की कक्षाएँ हों, वहां वैधानिक, प्रशासकीय, अन्र्तराष्ट्रीय कानून आदि में
अनुसंधान की सुविधाएँ दी जाए ।
चिकित्सा । 1. एक मेडिकल कॉलेज के लिए प्रवेश की अधिकतम संख्या 100 होनी चाहिए और उस
अनुसंधान के लिए समुचित स्टॉफ और उपकरण उपलब्ध होने चाहिए । 2. एक कॉलेज में प्रविष्ट प्रति छात्र 10 रोगी समस्याएँ होनी चाहिए । 3. सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपचार को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ।
4. देशी प्रणालियों में अनुसंधान हेतु सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए । (ल) औद्योगिक सम्बन्ध
आयोग ने औद्योगिक सम्बन्धों में प्रशिक्षण की आवश्यकता को अनुभव किया और सुझाव दिया कि यह प्रशिक्षण दो स्तरों पर किया जाए- स्नातकपूर्ण और स्नातकोत्तर ।।
आयोग ने कृषि, वाणिज्य, शिक्षा, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, कानून, चिकित्सा शिक्षा एवं औद्योगिक सम्बन्ध के बारे में विचार प्रस्तुत किये हैं उन्हें लागू करने से व्यावसायिक शिक्षा का स्तर काफी ऊँचा उठ सकता है जिसमें देश का आर्थिक विकास अधिक तीव्र गति से हो सकता है । 14.8.6 धार्मिक शिक्षा
आयोग ने धार्मिक शिक्षा के बारे में निम्न सुझाव प्रस्तुत किये हैं1. सभी शिक्षा संस्थाओं के दैनिक कार्य कुछ क्षण तक मौन रहकर आन्तरिक चिंतन के
साथ प्रारम्भ किये जाएँ ।
188

1.
०i
&
2. किसी कक्षा के प्रथम वर्ष में संसार की महान धार्मिक विभूतियाँ – महात्मा गाँधी,
गौतम बुद्ध, कनयुसियस सुकरात, ईसा, मुहम्मद साहब और गुरूनानक देव आदि के
जीवन चरित्र पढ़ाये जाए । 3. दवितीय वर्ष में संसार के धर्मग्रन्थो से सार्वजनिक सामग्रियाँ संग्रहीत करके पढ़ाई जाए। 4. तृतीय वर्ष में धर्म के दर्शन की विशिष्ट समस्याओं पर विचार विनिमय किया जाए । 5. धर्म को केवल अनुशासन, प्रशिक्षण और साधना के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।
अत: औपचारिक धार्मिक शिक्षा का बहिष्कार करके आध्यात्मिक प्रशिक्षण पर ध्यान केन्द्रित किया जाए । आयोग ने धार्मिक शिक्षा के बारे में अति विस्तृत दृष्टिकोण को अपनाया तथा धर्म की विशाल व्याख्या की है लेकिन हमारे विचार से आयोग को एक ऐसी पुस्तक की रचना
का सुझाव देना चाहिए था, जिसमें नैतिकता, सदाचार, सद्व्यवहार के सिद्धान्त होते । स्वमूल्यांकन प्रश्न
अध्यापक वर्ग के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की सिफारिशों का उल्लेख कीजिए? पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की सिफारिशों का उल्लेख कीजिए? व्यवसायिक शिक्षा के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की सिफारिशों
का उल्लेख कीजिए? 14.8.7 शिक्षा का माध्यम
शिक्षाविदों का शिक्षा के माध्यम पर गम्भीर मतभेद था अतः आयोग ने शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में निम्नलिखित संस्तुतियाँ प्रस्तुत की है1. संघीय भाषा विविध स्त्रोतों से शब्दों के आत्मीकरण द्वारा विकसित होनी चाहिए और
शब्दों के अवधारणा में जो विभिन्न स्त्रोतों से भारतीय भाषाओं में पहले से प्रवेश कर
चुके है, अलगाव के खतरे से बचाना चाहिए । 2. अन्र्तराष्ट्रीय प्रावैधिक और वैज्ञानिक पारिभाषिक शब्दों को अपनाया जाए । इन शब्दों
का भारतीय भाषाओं की ध्वनि, प्रकृति और उच्चारण के अनुसार भारतीयकरण किया
जाए । 3. उच्च शिक्षा के माध्यम रूप में अंग्रेजी के बजाए किसी भारतीय भाषा का प्रयोग शीघ्र
| से शीघ्र प्रारम्भ किया जाए । 4. संस्कृत जटिल है, इसके अध्ययन के लिए बहुत समय और परिश्रम की आवश्यकता है,
इसमें उपयुक्त वैज्ञानिक शब्द नहीं है । इन कठिनाइयों के कारण संस्कृत को शिक्षा के माध्यम के पद पर प्रतिष्ठित नहीं किया जा सकता । अत: संस्कृत को शिक्षा का
माध्यम न बनाया जाए । 5. उच्चतर माध्यमिक और विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों को 3 भाषाएँ पढ़ाई जाए
प्रादेशिक भाषा, संघीय भाषा और अंग्रेजी ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *