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किया जाना चाहिए विज्ञान का विकास राष्ट्रीय,सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परम्पराओं के आधार पर हो विज्ञान की शिक्षा में उसके मूलभूत सिद्धान्तों एवं प्रक्रियाओं के विवेकपूर्ण तथा
सृजनात्मक चिन्तन पर बल दिया जाये । (v) वैज्ञानिक मानवशक्ति (Manpower ) का उपयोग पूरी कुशलता के साथ किया जाये ।। (vi) विदेशों से विजिटिंग प्रोफेसर नियुक्त किये जाये तथा भारत के जो ख्यातिनाम वैज्ञानिक
विदेशों में काम कर रहे हैं, उन्हें भारत में आमन्त्रित किया जाये । (vii) विज्ञान और गणित के उच्च अध्ययन केन्द्र स्थापित कर उनमें योग्य एवं प्रतिभाशाली
व्यक्तियों को शिक्षकों के रूप में नियुक्त किया जाये ।। (viii) । विश्वविद्यालयों में अनुसंधान कार्य को बढ़ावा देना चाहिए तथा इसके लिए पर्याप्त
धनराशि की व्यवस्था की जाये । । (ix) सरकार को परामर्श देने के लिए वैज्ञानिक सलाहकार समितियों का गठन जिनमें
विश्वविद्यालयों अनुसंधान संस्थाओं, उद्योगों एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े हुए व्यक्तियों को स्थान दिया जाये ।
इस प्रकार आयोग ने विज्ञान की शिक्षा के लिए सर्वोत्तम छात्रों के चयन का महत्वपूर्ण सुझाव दिया जिससे ये छात्र विज्ञान के विकास एवं अनुसंधान कार्यों में सृजनात्मकता एवं
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चिन्तन के आधार पर योगदान कर सके । साथ ही आयोग का यह सुझाव भी महत्वपूर्ण है कि विज्ञान का विकास राष्ट्र की संस्कृति आवश्यकताओं एवं आध्यात्मिकता के अनुरूप होना चाहिए। 16.3.17 वयस्क शिक्षा
शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है । यह किसी समयावधि से बंधी हुई नहीं है । जो व्यक्ति किसी कारणवश बचपन एवं किशोरावस्था में पढ़ लिख नहीं पाते, उनकी योग्यता एवं क्षमता को विकसित कर उन्हें समाजोपयोगी बनाने की दृष्टि से उनकी पढ़ाई लिखाई आवश्यक है । भारत में आज भी लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या पढ़ना लिखना नहीं जानती । आयोग के कार्यकाल के दौरान तो यह प्रतिशत बहुत अधिक था अतः आयोग का विचार था कि प्रौढ़ों की सुरक्षा और उन्नति के लिए तथा उनके समाज में अधिक से अधिक योगदान के लिए उनको शिक्षित करना अति आवश्यक है । इस दृष्टि से आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये :(i) 6 से 14 वर्ष के बालकों के लिए यदि नियमित विद्यालयों में जाना संभव नहीं है तो
उनके लिए अंशकालीन शिक्षा व्यवस्था की जाये ।। (ii) निरक्षरता को दूर करने में जन सहयोग लेना चाहिए ।
15 से 30 वर्ष आयुवर्ग के लोगों के लिए अंशकालीन एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाये जायें । महिलाओं के लिए संक्षिप्त पाठ्यक्रम चलाये जाये तथा उन्हें साक्षर बनाने के लिए ग्राम सेविकाओं की नियुक्ति की जाये । साक्षरता अभियान नियोजन आधारित होना चाहिए अनुशीलन कार्यक्रम (Follow up programme) निरन्तर चलना चाहिए, इसमें चल पुस्तकालय सहायक हो सकते हैं । हर शिक्षा संस्था के द्वारा नियमित कक्षाओं के बाद उन व्यक्तियों (वयस्कों) के लिए, जो पढ़ना चाहते हैं ऐसे पाठ्य विषय पढ़ाये जाये जो वयस्कों के सामान्य ज्ञान एवं
अनुभवों में वृद्धि कर सके । (viii) अंशकालीन शिक्षा भी न लेने वाले वयस्कों के लिए पत्र व्यवहार द्वारा शिक्षा
(Course) की व्यवस्था की जाये । । (ix) विश्वविद्यालयों को भी इस कार्यक्रम में सहयोग देने के लिए अपने यहाँ प्रौढ़ शिक्षा
केन्द्र स्थापित करना चाहिए ।
इस प्रकार आयोग ने प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अंशकालीन एवं पत्र व्यवहार द्वारा शिक्षा देने का सुझाव दिया । साथ ही इस कार्यक्रम के लिए सरकार, विश्वविद्यालय, शिक्षा संस्थानों तथा जन सहयोग सभी के सहयोग का सुझाव दिया । इस कार्यक्रम के लिए चल पुस्तकालयों के प्रयोग को भी आवश्यक माना गया । 16.3.18 शिक्षा का नियोजन एवं प्रशासन ।
किसी भी कार्य की सफलता के लिए उसकी पूर्व योजना बनाना आवश्यक है । शिक्षा के क्षेत्र में भी लक्ष्य प्राप्ति हेतु शिक्षा की योजना राष्ट्रीय, राज्य, जिला एवं संस्थागत सभी स्तरों पर बनाना आवश्यक है | योजना बनाने के बाद उसकी कुशल और प्रभावशाली क्रियान्विति के
(vi)
(vii)
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लिए कुशल एवं योग्य प्रशासन की आवश्यकता होती है । आयोग ने शैक्षिक योजना एवं प्रशासन के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिये हैं 😐 (i) शिक्षा के विकास के लिए विस्तृत एवं प्रभावशाली पद्धति का निर्माण करना चाहिए । (ii) Asian Institute of Educational Planning’ के सहयोग से विभिन्न राज्यों में
शैक्षिक आयोजन का कार्य किया जाये । (iii) अपव्यय को रोकने के लिए केवल कुछ ही कार्यक्रम लिए जाये |
‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ शिक्षा नियोजन, प्रशासन तथा वित्त से संबंधित विषयों
का अध्ययन करने के लिए उच्च केन्द्र स्थापित करने चाहिए । (v) विदयालयी शिक्षा में स्थानीय एवं राज्य की तथा उच्च शिक्षा में केन्द्र व राज्य की
साझेदारी हो । (vi) शिक्षा के प्रशासन के लिए जिला स्तर पर जिला स्कूल बोर्ड तथा राज्य स्तर पर शिक्षा
परिषद् का गठन किया जाये । राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के प्रशासन का संबंध शिक्षा
मंत्रालय, यू.जी.सी. एवं एन.सी.ई.आर.टी. से है । (vii) राज्यों में शिक्षा सचिवालय शिक्षा संबंधी समस्याओं (वित्तीय एवं प्रशासनिक) पर
सरकारी नीतियों के अनुरूप विचार करें । (viii) केन्द्र एवं राज्य स्तर पर प्रशासन के लिए क्रमश: भारतीय शिक्षा सेवा (I.E.S.) तथा
राज्य शिक्षा सेवा (PES) प्रारम्भ की जाये ।।
इस प्रकार आयोग ने शिक्षा के नियोजन एवं प्रशासन को शैक्षिक विकास का प्रमुख आधार मानते हुए इनके लिए केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर विभिन्न अभिकरणों को उत्तरदायी माना तथा इसमें केन्द्र, राज्य तथा स्थानीय सहयोग का सुझाव दिया । 16.3.19 शिक्षा की वित्तीय व्यवस्था
शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय विनियोग है, जिसके परिणामस्वरूप सनागरिकों का विकास किया जाता है जो राष्ट्र के विकास में योगदान देते हैं । अत: शिक्षा के लिए राष्ट्रीय, राज्य, जिला एवं विद्यालयी स्तर पर बजट बनाकर वित्त की व्यवस्था की जाती है । आयोग ने शिक्षा में वित्त के महत्व को दृष्टिगत रखकर इससे संबंधित निम्नलिखित सुझाव दिये 😐 (i) शैक्षिक व्यय में आवश्यकतानुसार वृद्धि करनी चाहिए । (i) । कुल धनराशि का 2/3 भाग विद्यालयी शिक्षा तथा 1/3 भाग उच्च शिक्षा पर व्यय
करना चाहिए । शिक्षकों के वेतन में वृद्धि की जानी चाहिए । शिक्षा के लिए धन की व्यवस्था करने के लिए स्थानीय समुदाय एवं स्वैच्छिक संस्थाओं का सहयोग लेना चाहिए । राज्यों के द्वारा जिला परिषदों को शिक्षकों के वेतन भत्ते, पुस्तकालय, भवन, फर्नीचर तथा प्रशासकीय कार्यों के लिए सहायता अनुदान देना चाहिए ।
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इस प्रकार आयोग ने आवश्यकतानुसार शैक्षिक व्ययों में वृद्धि करने का सुझाव दिया । साथ ही शिक्षा के लिए धन की व्यवस्था हेतु स्थानीय समुदाय का सहयोग लेने संबंधी महत्वपूर्ण सुझाव दिया । 16.4 आयोग का मूल्यांकन

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